الخميس - 24 أيلول 2020
بيروت 30 °

بيدٍ مبتورةٍ يودّعُ الشهداءُ راياتهم

المصدر: " ا ف ب"
بهاء إيعالي
بيدٍ مبتورةٍ يودّعُ الشهداءُ راياتهم
بيدٍ مبتورةٍ يودّعُ الشهداءُ راياتهم
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من تلك المسافة

الممتدّة\r\n

بين الـ "هُناكَيْن"*\r\n

ثمّة صراخ\r\n

تسمعه قطط ممسوسة\r\n

وتندفع\r\n

إلى تفاليش الحنين القاتم.\r\n

***\r\n

ينطلق رقّاص السّاعة\r\n

ينحتُ دائرةً\r\n

لوجه الأرض العجوز\r\n

ربّما\r\n

خالَه الأصدقاء\r\n

أنّه\r\n

يبحثُ عن شظيّةٍ\r\n

خرجتْ من أبابيل.\r\n

*"هُناكَيْن": هناك+ هناك\r\n

***\r\n

فوق انحدار الشّفق\r\n

تتساقط الأوراقُ\r\n

مُتّخذةً\r\n

شكلَ الجثث.\r\n

***\r\n

هواء\r\n

وشمسٌ صغيرة\r\n

ينزلقان ببطء\r\n

صوب الظلّ\r\n

يحتفيان بموتهما\r\n

ليخرج منه آخرون.\r\n

***\r\n

فقط\r\n

حين يأتي الخريف\r\n

وتقتلُنا أصداءُ موته؛\r\n

كقطراتٍ\r\n

تشرُّ من حنفيّة معطّلة\r\n

أحاولُ تجديد عودتي.\r\n

***\r\n

الغابة\r\n

ترسمُ حطّابيها\r\n

وتقتلهم\r\n

حيثُ يجدُ واحدهم\r\n

غنيمَته\r\n

كي تبقى\r\n

وتتمدّد\r\n

في هذا الأفق العقيم.\r\n

***\r\n

بيدٍ مبتورةٍ\r\n

يودّعُ الشهداءُ\r\n

راياتهم.\r\n

***\r\n

ينحسرُ الكون\r\n

في زاويةٍ ضيّقةٍ\r\n

اسمُها الوطن.\r\n

***\r\n

هذا الرّمل\r\n

هو ليمون الأرض\r\n

دون أن يسقط.\r\n

***\r\n

كأنّ الموتى\r\n

كانوا\r\n

قد قرّروا العودة\r\n

لكنّ شأنهم\r\n

الغياب.\r\n

***\r\n

كأنّنا\r\n

ننتظر\r\n

سقوطاً فقط\r\n

كالشّهداء.\r\n

***\r\n

الهواءُ الملوّث\r\n

بزفير القتلى\r\n

يروّض النّسرَ\r\n

ليصطاد\r\n

حين تظهر الجثّة\r\n

وتأكلُ أطرافها.\r\n

***\r\n

فوق الشّمس\r\n

تحترق الأصابع\r\n

لتبني مجداً\r\n

لا ظلَّ له\r\n

حيث ينتظر الإلهُ قدومَنا.\r\n

***\r\n

هنا\r\n

حيث ينتظر الصّفيحُ\r\n

المطرَ\r\n

ليسقط\r\n

يستريح التّرابُ\r\n

لاتّساع مساحة الحُبّ.\r\n

***\r\n

يحاور الضوءُ أجسادَنا\r\n

ويرمي الحوارَ\r\n

على الأرض\r\n

مُلتصِقاً بنا.\r\n

***\r\n

ذاكرةُ الإسمنت\r\n

تخفي حكاياتٍ\r\n

من الموت والنّوم\r\n

تهربُ بصمتِها\r\n

لئلّا تزدريها الحدائقُ.\r\n

***\r\n

قبالة كلّ هذه الأشياء\r\n

أغلق عينيّ\r\n

أسيرُ\r\n

أرسم خيبتي\r\n

ببعض الحصى\r\n

وأسحقها.

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